वातावरण में एक ओर उनकी मधुर स्मृतियों की सुगंध थी, तो दूसरी ओर उनकी कमी का भाव हर हृदय को भावुक कर रहा था।

महासमुंद। आध्यात्मिकता, प्रेम और त्याग की जीवंत मिसाल रहीं राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी जी की प्रथम पुण्य स्मृति दिवस आज महासमुंद स्थित उपकार भवन सेवाकेंद्र में गहन भावनाओं और श्रद्धा के साथ मनाया गया। वातावरण में एक ओर उनकी मधुर स्मृतियों की सुगंध थी, तो दूसरी ओर उनकी कमी का भाव हर हृदय को भावुक कर रहा था।
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्थान प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से जुड़े ब्रह्माकुमारी भाई-बहनों ने नम आंखों से दादी जी को पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें याद किया। हर श्रद्धांजलि के साथ मानो यह संकल्प भी गूंज रहा था कि उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ही सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की जा सकती है।
सेवाकेंद्र संचालिका ब्रह्माकुमारी प्रीति दीदी ने दादी जी के जीवन को स्मरण करते हुए कहा कि उनका संपूर्ण जीवन प्रेम, तपस्या और त्याग का अद्वितीय संगम था। मात्र 13 वर्ष की कोमल आयु में ईश्वरीय मार्ग को अपनाकर उन्होंने अपने जीवन को मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया—यह समर्पण ही उन्हें महान बनाता है।

आज का दिन संस्थान द्वारा “विश्व एकता दिवस” के रूप में मनाया जाता है, जो दादी जी के उस दिव्य संकल्प की याद दिलाता है, जिसमें पूरा विश्व एक परिवार के रूप में जुड़ सके। सिंध के हैदराबाद में जन्मी दादी जी ने अपने आध्यात्मिक संस्कारों को जीवन का आधार बनाया और निराकार परमपिता परमात्मा शिव के संदेश को जन-जन तक पहुँचाया।
देश-विदेश में भ्रमण कर उन्होंने लाखों आत्माओं को आशा, शांति और नवयुग के स्वर्णिम भविष्य का संदेश दिया। उनका हर शब्द, हर मुस्कान और हर कर्म मानो आत्मा को छू लेने वाला अनुभव था। वे केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक जीवित प्रेरणा थीं।
उनकी सहज मुस्कान, विनम्रता, दयाभाव और हर किसी को अपनाने की भावना आज भी हर दिल में जीवित है। ऐसा लगता है मानो वे आज भी अपने हर अनुयायी के साथ हैं, हर कदम पर मार्गदर्शन दे रही हैं।
कार्यक्रम के अंत में सभी ने भावुक होकर यह संकल्प लिया कि वे दादी जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे और उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए मानवता की सेवा करेंगे—यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


परितोष शर्मा
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